tera sath hai kitna pyara

 Rizwan Ahmed Saif 


गीत: तेरा साथ है कितना प्यारा 

फिल्म: जांबाज़ 1986 

गायक गायिका : किशोर कुमार सपना मुखर्जी 

गीतकार: इन्दीवर 

संगीतकार: कल्याण जी आनंदजी 



तेरा साथ है कितना प्यारा 
तेरा साथ है कितना प्यारा 
कम लगता है जीवन सारा 
तेरे मिलन की लगन में 
हमें आना पड़ेगा दुनिया में दोबारा 
हमें आना पड़ेगा दुनिया में दोबारा 


मैंने... मैंने तन मन तुझ पे वारा 
प्यास बुझे ना करके नज़ारा 
तेरे मिलन की लगन में 
हमें आना पड़ेगा दुनिया में दोबारा 
हमें आना पड़ेगा दुनिया में दोबारा 
हो तेरा साथ है कितना प्यारा... 


जितनी तुझमे है अदा उतनी है वफ़ा 
उतनी है वफ़ा 
जितना जहाँ में प्यार है तुझसे मुझे  मिला  
तुझसे मुझे मिला 
बढ़ती जाए ये बेताबी 
बढ़ती जाये ये बेताबी जितना करूँ नज़ारा 
हमें आना पड़ेगा दुनिया में दोबारा 
हमें आना पड़ेगा दुनिया में दोबारा 
हो तेरा साथ है कितना प्यारा... 


प्यार के एक एक पल पे है... 
सौ जीवन क़ुर्बान सौ जीवन क़ुर्बान 
प्यार कभी मरता नहीं.. 
मरते हैं इंसान मरते हैं इंसान 
नाम उसी का जीवन है जो 
नाम उसी का जीवन है जो तेरे साथ गुज़ारा 
हमें आना पड़ेगा दुनिया में दोबारा 
हमें आना पड़ेगा दुनिया में दोबारा 





hay re insan ki mazbooriyan lyrics



Rizwan Ahmed (Saif)  


फिल्म घूंघट 1980 

गायक : मोहम्मद रफ़ी 

संगीत : मोइहंमद रफ़ी / रवि 



हाय रे इंसान की मज़बूरिया 

हाय रे इंसान की मज़बूरिया 

पास रह कर भी हैं कितनी दूरियां दूरियां 

हाय रे इंसान की मज़बूरिया 


कुछ अँधेरे में नज़र आता नहीं 

कोई तारा राह दिखलाता नहीं 

जाने उम्मीदों की मंज़िल है कहाँ 

जाने उम्मीदों की मंज़िल है कहाँ 

हाय रे इंसान की मज़बूरिया 


शम्मा के अंजाम की किस को खबर 

कझटं होगी या जलेगी रात भर 

शम्मा के अंजाम की किस को खबर 

कझटं होगी या जलेगी रात भर 

जाने ये शोला बनेगा या धुंआ 

जाने ये शोला बनेगा या धुंआ 

हाय रे इंसान की मज़बूरिया 

पास रह कर भी हैं कितनी दूरियां दूरियां 

हाय रे इंसान की मज़बूरिया 




 

Babar ki beti ki kahani

 बाबर की बेटी की कहानी जिसने ठुकराए थे ऑटोमन सुल्तान के शाही फरमान :बीबीसी न्यूज़


ये कहानी सन 1576 की है जब हिंदुस्तान की सरज़मीं पर मुग़लिया सल्तनत का परचम लहरा रहा था और अरब दुनिया पर ऑटोमन साम्राज्य का राज था.


#हिंदुस्तान में अकबर शहंशाह थे तो ऑटोमन साम्राज्य का ताज़ सुल्तान मुराद अली के सिर पर था.


इसी दौर में मुग़लिया सल्तनत की एक राजकुमारी ने मक्का-मदीना की अभूतपूर्व यात्रा की.


मुग़लकालीन भारत में ये पहला मौका था जब कोई महिला पवित्र हज यात्रा पर गयी. हज को इस्लाम के पांच आधार स्तंभों में से एक माना जाता है.


ये मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर की बेटी गुलबदन बेगम की कहानी है जिन्होंने 53 साल की उम्र में फतेहपुर सीकरी की आरामदायक दुनिया छोड़कर एक ऐसी यात्रा पर जाने का फ़ैसला किया जो अगले छह सालों तक जारी रही.


गुलबदन बेगम इस यात्रा पर अकेले ही नहीं गईं बल्कि उन्होंने अपने साथ जाने वाली शाही महिलाओं के एक छोटे से समूह का नेतृत्व भी किया.


लेकिन अपने आप में शानदार रही इस यात्रा से जुड़े ब्योरे रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं हैं.


इतिहासकार मानते हैं कि शायद इसकी एक वजह ये रही हो कि दरबार के पुरुष इतिहासकारों ने महिला यात्रियों के ‘मान-सम्मान’ के नाम पर उनकी यात्रा से जुड़े तथ्यों को ज़ाहिर नहीं किया.


शानदार यात्रा की अधूरी दास्तां


इतिहासकार और लेखक रूबी लाल ने अपनी किताब 'वेगाबॉन्ड प्रिंसेज़: द ग्रेट एडवेंचर्स ऑफ़ गुलबदन' में इस यात्रा का ज़िक्र किया है.


रूबी लाल लिखती हैं कि गुलबदन बेगम की इस यात्रा में बहादुरी के साथ-साथ करुणा और विद्रोह से जुड़ी घटनाएं भी शामिल हैं.


गुलबदन बेगम को मुगल साम्राज्य की पहली और इकलौती महिला इतिहासकार माना जाता है.


उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों को अपनी किताब हुमायूं नामा में संकलित किया है. लेकिन उनकी ये किताब भी अधूरी है. इस किताब के कई पन्ने आज तक गायब हैं.


रूबी लाल ने इस किताब को लिखने के लिए शोध करते हुए ऑटोमन साम्राज्य के इतिहास से लेकर फारसी और मुगल पांडुलिपियों समेत तमाम दूसरे दस्तावेज़ों को खंगाला है.


वह कहती हैं, "गुलबदन एक ऐसे दौर में लिख रही थीं जब तत्कालीन इतिहासकारों की ओर से शाही हस्तियों की ओर से लिखी गयी रचनाओं की प्रतियां बनाना आम बात थी. लेकिन गुलबदन की किताब की एक भी पूर्ण प्रति उपलब्ध नहीं है."


"इतनी ताक़तवर महिला की अपनी तरह की इस इकलौती सी यात्रा पर चुप्पी बहुत कुछ कहती है."


सत्ता के केंद्र से दूरी


सन 1523 में काबुल में जन्म लेने वाली गुलबदन की माँ दिलदार बेगम थीं. वह बाबर की तीसरी पत्नी थीं.


गुलबदन के जन्म के वक़्त बाबर घर से दूर रहते हुए हिंदुस्तान पर चढ़ाई करने के मंसूबे बना रहे थे.


जब ये जंगें शुरू हुईं तो बाबर का घर आना कम हो गया. गुलबदन जल्द ही इसकी अभ्यस्त भी हो गयीं.


लेकिन घर के सबसे ताक़तवर शख़्स के साथ कभी-कभार मिलने का ये सिलसिला आगे भी जारी रहा.


पिता बाबर के बाद सौतेले भाई हुमायूं और भतीजे अकबर के साथ भी उनके मिलने-जुलने का सिलसिला ऐसा ही रहा.


लेकिन जब शाही ख़ानदान के पुरुष साम्राज्यों को विस्तार देने के लिए जंगें लड़ रहे थे तब गुलबदन मजबूत महिलाओं के साये में बड़ी हो रही थीं. ये महिलाएं बाबर की माँ, चाची, बहनें, बेगम और उनकी बेटियां थीं.


इन महिलाओं की दरबारी गतिविधियों में अहम भूमिका थी. वे राजाओं और राजकुमारों के विश्वासपात्रों और सलाहकारों की भूमिका निभाती थीं.


गुलबदन के बचपन में भी यात्राओं की एक ख़ास जगह थी. बाबर के आगरा तक साम्राज्य फैलाने के बाद वह छह साल की उम्र में काबुल से आगरा तक की यात्रा करने वाली पहली मुगल महिला बनीं.


इसके बाद वह एक विवाहित महिला के रूप में काबुल वापस आईं जब अफ़ग़ान राजा शेरशाह सूरी ने उनके परिवार को हिंदुस्तान से बाहर निकाल दिया.


ये यात्राएं महीनों तक जारी रहा करती थीं. गुलबदन बेगम शाही परिवार की दूसरी महिलाओं के साथ पहाड़ी रास्तों से गुज़रते हुए जोख़िम भरी यात्राएं किया करती थीं.


इन यात्राओं के दौरान वह दुश्मनों के साथ-साथ तमाम दूसरी मुश्किलों का भी सामना करती थीं.


रूबी लाल कहती हैं, "मुग़लिया महिलाएं खानाबदोश जीवनशैली की अभ्यस्त थीं. वे युद्ध लड़ रहे अपने पतियों के साथ लगातार नयी जगहों पर पलायन करने और अस्थाई शिविरों में रहने की अभ्यस्त थीं."


रूबी लाल कहती हैं कि शायद यात्रा करने की इसी आदत की वजह से उन्होंने अपने भतीजे अकबर से हज यात्रा पर जाने की इजाज़त मांगी.


जब अकबर से की बात

अकबर का सबसे बड़ा सपना मुग़लिया सल्तनत का परचम फहराना था. वह जैसे-जैसे हिन्दुस्तान में आगे बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे खुद को एक पवित्र शख़्स के रूप में दिखाने की कोशिश कर रहे थे.


वो पहला ऐसा मुग़ल बादशाह बना जिसने मुग़ल महिलाओं को बिल्कुल अलग-थलग कर हरम की चारदीवारी के अंदर रखने का फ़ैसला किया.


रूबी लिखती हैं, "शाही हरम में बादशाह के अलावा किसी को भी जाने की इजाज़त नहीं थी. इस हरम में सुंदर और कुंवारी लड़कियां रहती थीं. यह एक तरह से इस बात का सबूत था कि मुग़ल बादशाह की स्थिति लगभग दैवीय है."


लेकिन ज़िंदगी में आए इस ठहराव ने गुलबदन को परेशान कर दिया.


साल 1576 के अक्टूबर महीने में उन्होंने अकबर से कहा कि वह हज करने जाना चाहती थीं क्योंकि उन्होंने इसके लिए मन्नत मांगी थी.


अकबर ने इस यात्रा के लिए दो आलीशान मुग़ल जहाजों सलीमी और इलाही को इस्तेमाल करने की इजाज़त दी.


इस महिला दल के साथ सोने – चांदी से भरे बक्से गए जिन्हें खैरात के रूप में बांटा जाना था. इसके साथ ही हज़ारों रुपये कीमत की नकदी और बारह हज़ार सम्मान की पोशाकें भी गयीं.


रूबी लाल ने अपनी किताब में लिखा है, "जब लाल पत्थर वाली मुगलिया राजधानी फतेहपुर सीकरी की गलियों से इन महिलाओं का काफ़िला गुज़र रहा था तो इन्हें देखने के लिए सड़कों पर आम महिलाओं और पुरुषों की भीड़ मौजूद थी."


लेकिन इस यात्रा की शुरुआत ही ख़तरों से हुई. मक्का जाने वाला समुद्री रास्ता पुर्तगालियों के नियंत्रण में था जो मुसलमान जहाजों को लूटने और जलाने के लिए कुख्यात थे.


ईरान से होकर जाने वाला ज़मीनी रास्ता भी इतना ही जोख़िमभरा था क्योंकि इस रूट पर चरमपंथी गुट हुआ करते थे जो यात्रियों पर हमला कर देते थे.


इसी वजह से गुलबदन और उनके साथ गई महिलाएं लगभग एक साल तक सूरत में फंसी रहीं ताकि वे अपनी यात्रा के दौरान पुर्तगालियां से बच सकें.


इसके बाद वे अगले चार दिनों तक गर्म रेगिस्तान पर ऊंट की सवारी करके मक्का पहुंचीं.


जब सुल्तान मुराद के ख़िलाफ़ विद्रोह


उनकी इस यात्रा का सबसे दिलचस्प पहलू मक्का पहुंचने के बाद आया क्योंकि उन्होंने अपने साथ गयीं महिलाओं ने अगले चार सालों तक अरब दुनिया में रहने का फ़ैसला किया.


रूबी लाल लिखती हैं, "जिस तरह वे हरम छोड़ने पर एकमत थीं. उसी तरह वे रेगिस्तानी दुनिया में खानाबदोश जीवन जीते हुए आध्यात्मिकता की तलाश करने पर एकमत थीं."


गुलबदन और उनकी साथी महिलाओं ने जब दान देना शुरू किया तो उनकी हर जगह चर्चा होने लगी.


मुग़लिया सल्तनत की राजकुमारी गुलबदन बेगम की ओर से किए जा रहे दयालुता से भरे इन कार्यों ने ऑटोमन सुल्तान मुराद को नाराज़ कर दिया. क्योंकि उसने इसे अकबर की बढ़ती राजनीतिक शक्ति के रूप में देखा.


ऐसे में सुल्तान ने अपने लोगों को चार शाही फरमान भेजकर गुलबदन और उनके साथ गयीं मुग़लिया महिलाओं को अरब दुनिया से बेदखल करने को कहा.


लेकिन गुलबदन ने हर बार ये फरमान मानने से इनकार कर दिया.


रूबी लाल लिखती हैं, "एक मुग़ल महिला की ओर से विद्रोह की ये अभूतपूर्व घटना थी. यह बताती है कि वह अपनी आज़ादी को लेकर कितनी समर्पित थीं."


इसके बाद सुल्तान ने उनकी ज़िद से आजिज आकर इन महिलाओं के ख़िलाफ़ तुर्की भाषा में एक ऐसे शब्द का इस्तेमाल किया जिससे अकबर नाराज़ हो गया.


इस पांचवें फरमान के बाद 1580 में गुलबदन और उनकी साथी महिलाएं अरब से निकलकर दो साल लंबी यात्रा के बाद 1582 में फतेहपुर सीकरी पहुंचीं.


उनकी वापसी के बाद भी उन्हें एक नवाब के रूप में देखा गया. यही नहीं, अकबर ने उन्हें अकबरनामा में योगदान देने को भी कहा.



अकबरनामा में गुलबदन बेगम की इस यात्रा का विस्तार से ज़िक्र है. लेकिन अरब दुनिया में उनके बिताए वक़्त और सुल्तान मुराद की ओर से बाहर निकालने से जुड़ी घटनाओं का ज़िक्र नहीं है. यही नहीं, ये ज़िक्र कहीं और भी उपलब्ध नहीं है.

humne mana babu ji

 





Rizwan Ahmed 12-Oct-2020


  • हमने माना बाबूजी आप ने फकीरी देखी है 
  • तो किया अब पूरे देश से भीख मंगवायेंगे, 

  • हमने माना साहब आप ने बहुत गरीबी देखी है 
  • तो किया अब आप पूरे देश को गरीब ही बनाएंगे,

  • हमने माना बाबू जी आपने चाय बेची है
  • तो किया पूरे देश से चाय बिक़वाएँगे

  • हमने माना बाबूजी आपको पकोड़ो का कारोबार पसंद है
  • तो किया अब पूरे देश से पकोड़े बिक़वाएँगे

  • नाली से गैस निकली और चाय के ठेले तक पहुंची 
  • तो किया अब पूरे देश से चाय का ठेला लगवायेंगे, 

  • बैठ बाहर ज़ी स्टूडियो के बिक गए पकोड़े खूब 
  • तो किया अब पूरे देश से पकोड़े ही बिकवायेंगे,

  • आपने बचपन में मगरमछ के भी कान अमेठ दिए 
  • बताओ साहब हम कैसे उसके कान अमेठ पाएंगे 

  • एक सौ तीस में से छै सौ करोड़ का वोट आपने ले लिया 
  • बोलो साहब हज़ार करोड़ वोटर हम कहाँ से लाएंगे 

  • 350 का सिलंडर महंगा 1000 का सस्ता आपकी द्रष्टि में  
  • 2 हज़ार वाला सिलंडर बोलो साहब हम कैसे ले पाएंगे 

  • पेट्रोल का भी वही हाल खरीदने वाला है बस बेहाल 
  • पेट्रोल के पैसे नहीं बोलो साहब कैसे गाड़ी हम चलाएंगे, 
Please support me



golden words in urdu hindi and english

 Rizwan Ahmed Saif


جانتے ہو پاق موحبّت کیسے کہتے ہیں ؟

جب آپ آپس مے ایک دوسرے کے لئے دعا کرتے

 ہو اسے پاق موہببت کہتے ہیں 

जानते हो पाक मोहब्बत किसे कहते हैं ?

जब आप एक दुसरे के लिए दुआ करते हो 

उसे पाक मोहब्बत कहते हैं 

Do you know what is called pure love?

when you pray for each other

they are called pure love


سچچا عشق 

سچچا عشق وو نہیں جو ہوس پوری ہونے پر ختم ہو جائے 

سچچ عشق وو ہو جو ماشوک سامنے ہو اور ہاتھ لگانے کی ہمّت نا ہو 

सच्चा इश्क़ 

सच्चा इश्क़ वो नहीं जो हवस पूरी करने के बाद ख़त्म हो जाए 

सच्चा इश्क़ वो है जो माशूक सामने हो और हाथ लगाने की हिम्मत ना हो,

true love

True love is not that which ends after satisfying lust.

True love is when the beloved is right in front of you and you don't have the courage to touch it.


نفرت لفظوں مے نہیں لہزوں مے ہوتی ہے 

اس لئے لفظوں کے پیچھے مت بھاگیں 

नफरत शब्दों में नहीं लहजे में होती है

इसलिए शब्दों के पीछे मत भागो

Hate is not in words but in tone

So don't run after words


آپ جو دیکھتے ہیں اس پر کبھی یقین نہ کرو 

کیونکے دیکھنے مے تو نمک بھی چینی کی طرح لگتا ہے،

आप जो देखते हैं कभी उस पर यकीन ना करो 

क्योंकि देखने में तो नमक भी चीनी की तरह लगता है 

never believe what you see

Because salt also looks like sugar




fir se bachcha hona chahta hun

 



Writer Rizwan Ahmed 


बड़ा हूँ मगर फिर से बच्चा होना चाहता हूँ 

मैं किसी के सीने से लग के रोना चाहता हूँ


कभी इसके लिए जिया कभी उसके लिए जिया 

याद नहीं मुझे मैं कब अपने लिए जिया 

बुरा ना मानों मैं थोड़ा सा अपने लिए जीना चाहता हूँ 

मैं किसी के सीने से लग के रोना चाहता हूँ


माना के दूसरों के लिए जीने वालों को जन्नत मिलेगी 

यहाँ ना खिल सकी जो अरमानों की कली वो क़यामत में खिलेगी 

बताओ किया है बुरा जो थोड़ी सी जन्नत दुनिया में चाहता हूँ 

मैं किसी के सीने से लग के रोना चाहता हूँ


था शरारती ज्यादा प्यार माँ बाप का बचपन में पा ना सका 

थोड़ी ग़ुरबत भी थी इसलिए ज्यादा मुस्कुरा ना सका 

मुझे रुलाने वालों मैं भी अब खूब हंसना चाहता हूँ
 
मैं किसी के सीने से लग के रोना चाहता हूँ


मैं जानता हूँ मैं बात बात पे रो देता हूँ 

इसी रोने की वजह से अपनी कदर खो देता हूँ 

लेकिन मैं कब किसी और को रुलाना चाहता हूँ 

मैं किसी के सीने से लग के रोना चाहता हूँ


हूँ दिल का सच्चा इसी लिए चुटकिओं में दिल भर आता है 

ज़ुल्म सह लेता है ये दिल ज़ुल्म मगर नहीं कर पाता है 

अब अपने आपको ज़ुल्मों से बचाना चाहता हूँ 

मैं किसी के सीने से लग के रोना चाहता हूँ


झूठे ही सही मगर वो सच्चों से अच्छे दिन थे 

थोड़े ही थे मगर ज्यादा से नहीं ज़रा कम थे

उन्ही झूठे दिनों में फिर से लौट जाना चाहता हूँ 
 
मैं किसी के सीने से लग के रोना चाहता हूँ


सुनते ही मेरी गाडी के होरन को वो सब दौड़े आते थे 

मतलब ही के लिए सही मुझे देख कर सब मुस्कराते थे 

उसी मतलबी दुनिया में फिर जाना चाहता हूँ

मैं किसी के सीने से लग के रोना चाहता हूँ


बड़ा हूँ मगर फिर से बच्चा होना चाहता हूँ 

मैं किसी के सीने से लग के रोना चाहता हूँ
#सैफ 

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