Babri masjid

Rizwan Ahmed 


कहते हैं अयोध्या में राम जन्मे, वहीं खेले-कूदे, बड़े हुए, बनवास भेजे गये, लौटकर आये तो वहाँ राज भी किया। उनकी ज़िंदगी के हर पल को याद करने के लिए एक मंदिर बनाया गया। जहाँ खेले, वहाँ गुलेला मंदिर है। जहाँ पढ़ाई की, वहाँ वशिष्ठ मंदिर हैं। जहाँ बैठकर राज किया, वहाँ मंदिर है। जहाँ खाना खाया, वहाँ सीता रसोई है। जहाँ भरत रहे, वहाँ मंदिर है। हनुमान मंदिर है, कोप भवन है। सुमित्रा मंदिर है, दशरथ भवन है। ऐसे बीसियों मंदिर हैं, और इन सबकी उम्र 400-500 साल है। यानी ये मंदिर तब बने, जब हिंदुस्तान पर मुगल या मुसलमानों का राज रहा।



अजीब है न! कैसे बनने दिये होंगे मुसलमानों ने ये मंदिर! उन्हें तो मंदिर तोड़ने के लिए याद किया जाता है। उनके रहते एक पूरा शहर मंदिरों में तब्दील होता रहा और उन्होंने कुछ नहीं किया! कैसे अताताई थे वे जो मंदिरों के लिए जमीन दे रहे थे! शायद वे लोग झूठे होंगे जो बताते हैं कि जहाँ गुलेला मंदिर बनना था, उसके लिए जमीन मुसलमान शासकों ने ही दी। दिगंबर अखाड़े में रखा वह दस्तावेज़ भी गलत ही होगा जिसमें लिखा है कि मुसलमान राजाओं ने मंदिरों के निर्माण के लिए 500 बीघा जमीन दी। निर्मोही अखाड़े के लिए नवाब सिराजुदौला के जमीन देने की बात भी सच नहीं ही होगी। सच तो बस बाबर है और उसकी बनवाई बाबरी मस्जिद! 


अब तो तुलसी भी गलत लगने लगे हैं जो 1528 के आसपास ही जन्मे थे। लोग कहते हैं कि 1528 में ही बाबर ने राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनवाई। तुलसी ने तो देखा या सुना होगा उस बात को। राम के जन्म स्थल को बाबर तोड़ रहा था और तुलसी लिख रहे थे -- "माँग के खाइबो मसीत में सोइबो।" और फिर उन्होंने राम चरित मानस लिख डाली। राम मंदिर के टूटने का और बाबरी मस्जिद बनने का क्या तुलसी को जरा भी अफसोस नहीं रहा होगा? कहीं लिखा क्यों नहीं?


अयोध्या में सच और झूठ अपने मायने खो चुके हैं। मुसलमान पाँच पीढ़ी से वहाँ फूलों की खेती कर रहे हैं। उनके फूल सब मंदिरों पर, उनमें बसे देवताओं पर और राम पर चढ़ते रहे। मुसलमान वहाँ खड़ाऊँ बनाने के पेशे में जाने कब से हैं। संन्यासी, ऋषि-मुनि, राम भक्त, मुसलमानों की बनाई खड़ाऊँ पहनते रहे। सुंदर भवन मंदिर का सारा प्रबंध चार दशकों तक एक मुसलमान के हाथों में रहा। 1949 में इसकी कमान संभालने वाले मुन्नू मियाँ 23 दिसंबर 1992 तक इसके मैनेजर रहे। जब कभी लोग कम होते और आरती के वक्त मुन्नू मियाँ खुद खड़ताल बजाने खड़े हो जाते, तब क्या वह सोचते होंगे कि अयोध्या का सच क्या है और झूठ क्या?


अग्रवालों के बनवाये एक मंदिर की हर ईंट पर 786 लिखा है। उसके लिए सारी ईंटें राजा हुसैन अली खाँ ने दीं। किसे सच मानें? क्या मंदिर बनवाने वाले वे अग्रवाल सनकी थे? क्या वह हुसैन अली खाँ दीवाने थे जो मंदिर के लिए ईंटें दे रहे थे? इस मंदिर में दुआ के लिए उठने वाले हाथ हिंदू या मुसलमान किसके हों, पहचाना ही नहीं जाता, सब आते हैं। एक नंबर 786 ने इस मंदिर को सबका बना दिया। क्या बस 6 दिसंबर 1992 ही सच है!


6 दिसंबर 1992 के बाद सरकार ने अयोध्या के ज्यादातर मंदिरों को अधिग्रहण में ले लिया। वहाँ ताले पड़ गये। आरती बंद हो गई। लोगों का आना-जाना बंद हो गया। बंद दरवाजों के पीछे बैठे देवी-देवता क्या कोसते होंगे कभी उन्हें जो एक गुंबद पर चढ़कर राम को छू लेने की कोशिश कर रहे थे? सूने पड़े हनुमान मंदिर या सीता रसोई में उस खून की गंध नहीं आती होगी जो राम के नाम पर अयोध्या और भारत में बहाया गया?


अयोध्या एक शहर के मसले में बदल जाने की कहानी है। 


अयोध्या एक तहज़ीब के मर जाने की कहानी है।


(नोट -- उपरोक्त आलेख सरोज मिश्र जी का है। वह मेरी मित्रसूची में नहीं हैं। होते तो उन्हें टैग करता। इस आलेख को कई मित्रों ने साझा किया है। इसे पढ़कर बार-बार आँखें नम हुईं, हृदय भर आया, और इसी कारण मैं भी इसे साझा करने से स्वयं को रोक नहीं पा रहा हूँ।)

baten sone ke jaisi

  



Rizwan Ahmed (Saif)


کسی کے معافی مانگ لینے سے یہ ثابت نہیں ہوتا کے 

وو غلط ہے 

بلکی اسے یہ ثابت ہوتا ہے کے اسکے اندر رشتہ نبھانے 

کی صلاحیت ہم سے جیادہ ہے،


किसी के माफ़ी मांग लेने से ये साबित नहीं होता के 

वो ग़लत है 

बल्कि उससे ये साबित होता है के उसके अंदर रिश्ता निभाने 

की सलाहियत हम से ज्यादा है, 


Apologizing to someone doesn't prove that

that's wrong

Rather, it proves that there is a need to maintain a relationship within him

has more talent than us,



नोट:मैं चाहता हूँ आगे भी इसी तरह लिखता जाऊं इसके लिए मुझे आप सब की सपोर्ट चाहिए तीन सालों से इस वेबसाइट को चला रहा हूँ बहुत पैसा खर्च कर चूका हूँ आप लोग मुझे सपोर्ट करें 

UPI ID है 9910222746@axisbank या 9910222746 इस नंबर पर मुझे सपोर्ट करें,

या QR कोड को स्कैन करके मुझे सपोर्ट करें,


حالات اور وقت کی تبدیلیوں کے ساتھ بدلنے والے 
تللکوں سے بہتر ہے کے انسان تنہا رہے، 

हालात और वक़्त के बदलाव के साथ बदलने 
वाले ताल्लुकों से बेहतर है के इंसान तनहा रहे,

 change with the change of circumstances and times

It is better for a person to be alone than to have relationships


حضرت علی 

یہ دنیا بھی کتنی عجیب ہے 

ایماندار کو بیوکوف بے امان کو عقلمند 

اور بے حیاء کو خوبصورت کہتی ہے 


हज़रत अली 

ये दुनिया भी कितनी अजीब है 

ईमानदार को बेवकूफ बेईमान को अक़्लमंद 

और बे हया को खूबसूरत कहती है 

hazrat ali

how strange is this world

stupid to honest dishonest to intelligent

And shameless calls her beautiful


وقت نے ایک ہی بات سکھائی ہے 

ہر تعلّق ناتا رشتہ تبھی تک زندہ ہے 

جب تک آپ دوسروں کے معیار توققو پر 

پورا اترتے رہیں،


वक़्त ने एक ही बात सिखाई है 

हर ताल्लुक़ नाता रिश्ता तभी तक ज़िंदा है 

जब तक आप दूसरों के मियार तवक़्क़ो पर 

पूता उतरते रहें, 


time has taught me only one thing

every relationship lasts

as long as you serve the needs of others


یاد رکھیں جو لوگ آپکو غلط سمجھتے ہیں 

وو مرتے دم تک آپکو غلط ہی سمجھیںگے 

کیونکے علاج نظروں کا ہوتا ہے نظریے کا نہیں 


याद रखें जो लोग आपको ग़लत समझते हैं 

वो मरते दम तक आपको ग़लत ही समझेंगे क्योंकि 

इलाज नज़र को होता है नज़रिये का नहीं,


remember those who misunderstand you

They will misunderstand you till the day they die because

The treatment is done by sight, not by thinking.

Qeemtin Baten

 

 


Rizwan Ahmed (Saif)


انسان کی سبسے بڑی دشمن اسکی منفی سوچ ہے 

جو اسکوسبکوچھ ہونے بعد بھیپریشان رکھتی ہے 

اسلئےہمیشہ  اچّھا سوچیں اور خش رہیں 


इंसान की सबसे बड़ी दुश्मन उसकी मनफ़ी (नकारात्मक) सोच है 

जो उसे सबकुछ होने के बावजूद भी खुश नहीं रहने देती 

इसलिए हमेशा अच्छा सोचें और खुश रहें 


Man's biggest enemy is his negative thinking.

that doesn't let him be happy in spite of everything

so always think good and be happy



دنیا کی کوئی امید انسان کو بہت لمبے عرصے تک 

سمبھال  کر نہیں  رکھ سکتی سواے اس امید کے، کے الله 
ایک دن سب ٹھیک کر دیگا اگر انسان کا الله پر مکمّل امان ہے، 
رضوان 

दुनिया की कोई भी उम्मीद इंसान को बहुत लम्बे अरसे तक 
संभाल कर नहीं रख सकती सिवाए इस उम्मीद के, के अल्लाह 
एक दिन सब ठीक कर देगा अगर इंसान का अल्लाह पर मुकम्मल 
ईमान है,
रिज़वान 

Any hope in the world will last a very long time
can't handle it,
Except this hope
Allah One day everything will be fine if a person's faith in Allah is perfect.
Rizwan
 

جو عزت چاہتا ہے اسے ان باتوں سے دور رہنا چاہے 
مخلوق سے سوال کرنا دوسروں می عیب نکالنا 
دنیا کی رونقوں کا خواہشمند آخرت کی لذّت سے محروم رہتا ہے،

जो इज़्ज़त चाहता है उसे इन बातों से दूर रहना चाहिए 
मख्लूक़ के आगे हाथ फैलाना दूसरों में ऐब निकालना 
दुनिया की रौनक़ों का ख्वाहिशमंद आख़िरत की लज़्ज़तों से 
दूर रहता है,

Those who want respect should stay away from these things
Spreading hands in front of creation, finding faults in others
The greedy for the pleasures of the world stays away from the pleasures of the hereafter,

اپنے ارد گرد اچّھے عمال کے چراغ جلاتے رہو 
تاکی موت کے راستوں سے گزرتے ہوے ہمیں 
اندھیروں کو احساس نا ہو،

अपने आसपास अच्छे आमालों के चराग़ जलाते रहो 
ताकि मौत के रास्तों से गुज़रते वक़्त हमें अंधेरों 
का अहसास ना हो, 

keep lighting the lamp of good deeds around you
So that while passing through the paths of death, we do not feel the darkness



انسان وولڑائی کبھی نہی جیت سکتا 
جسمے دشمن اسکے اپنے ہوں،

इंसान वो लड़ाई कभी नहीं जीत सकता 
जिसमे दुश्मन उसके अपने हों,

man can never win that fight
In whom the enemy is his own,

زندگی کی کتاب مے اتنی غلطیاں مت کرو 
کے پینسل سے پہلے ربر ختم ہو جائے 
اور توبہ سے پہلے زدگی،

ज़िन्दगी की किताब में इतनी गलतियां मत करो 
के पेंसिल से पहले रबर ख़त्म हो जाए 
और तौबा से पहले ज़िंदगी,

don't make so many mistakes in the book of life
Let the eraser run out before the pencil
and life before repentance,

دنیا مے ایسے بھی لوگ موجود ہے جو اپنے غموں کی گٹھری باندھ 
کر اپنے سینے کے اندھیروں مے ڈال کر لب سی لیتے ہیں 
لیکن اگر انھے ایک لمحے کی بھی خوشی مل جائے تو وو سوچتے ہیں 
اپنے تمام عزیز او اقارب کے ساتھ بانٹ دیں 

दुनिया में ऐसे भी लोग मौजूद हैं जो अपने ग़मों की गठड़ी बांध 
कर अपने सीने के अंधेरों में डाल कर लब सी लेते हैं 
लेकिन अगर उन्हें एक लम्हे की भी ख़ुशी मिल जाये तो 
वो सोचते हैं अपने तमाम अपनों के साथ बाँट लें, 

There are people in the world who tie the knot of their sorrows.
By putting it in the darkness of your chest, you take care of it
But if they get even a moment's happiness
They think to share with all their loved ones,

molvi liyaqat ali

इसी बीच सिपाही विद्रोह मेरठ, दिल्ली और अन्य क्षेत्रों में शुरू हुआ और विद्रोह की गर्मी ने इलाहाबाद को भी घेर लिया। मौलवी और उनके सलाहकारों ने जून 1857 में इलाहाबाद में विद्रोह फैलने से बहुत पहले अपने हमलों को सुनियोजित तरीके से करने की योजना बनाई थी


Rizwan Ahmed


 जानिए मौलवी लियाकत अली के बारे में ।


 कल्पना करिए, उस वक्त की विश्व की सबसे बड़ी ताकत ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जंग लड़ कर अपनी तलवार और तोप की ज़ोर पर 10 दिनों के लिए ही सही इलाहाबाद को ब्रिटिश हुकूमत से स्वतंत्र कराकर यहां अपना जिलाधिकारी और एसडीएम नियुक्त करने वाले मौलाना लियाकत अली कितनी बड़ी हस्ती रहें होंगे जिन्हें भारतीय इतिहास में भुला दिया गया।

० तो कौन थे मौलवी लियाकत अली ? आईए जानते हैं।


मौलवी लियाकत अली का जन्म 05 अक्टूबर 1817 को इलाहाबाद जिले के ही "महगाँव" नाम के एक गांव में हुआ था जो शहर से 30 किमी दूर कानपुर जीटी रोड पर ही स्थित है। सैयद मेहर अली और अमीना बीबी के घर में जन्में मौलवी लियाकत हुसैन अपने वालदैन के‌‌ इकलौते पुत्र थे। मौलवी लियाकत अली के पिता सैयद मेहर अली के छोटे भाई सैयद दयाम अली ने "चंचल बाई" से शादी की थी जो बनारस में रहने वाले झांसी की रानी लक्ष्मी बाई के पिता "मोरोपंत तांबे" की बहन थीं। यही कारण था कि मौलवी लियाकत अली अक्सर झांसी की रानी लक्ष्मी बाई को छबीली बहन या छोटी बहन के रूप में संबोधित करते थे। 

मौलवी लियाकत अली एक अच्छे वक्ता, लेखक और अपने साथियों की देखभाल करने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने और उनके साथियों ने हरदोई जिले के सैंडी, बिलग्राम और पाली जैसे विभिन्न स्थानों पर ब्रिटिश सरकार विरोधी अभियानों का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया। तत्कालीन जमींदारों और क्षेत्र के अन्य प्रमुख लोगों ने मौलवी को अपना पूरा समर्थन दिया और उन्हें अपने नेता के रूप में स्वीकार किया। 

इसी बीच सिपाही विद्रोह मेरठ, दिल्ली और अन्य क्षेत्रों में शुरू हुआ और विद्रोह की गर्मी ने इलाहाबाद को भी घेर लिया। मौलवी और उनके सलाहकारों ने जून 1857 में इलाहाबाद में विद्रोह फैलने से बहुत पहले अपने हमलों को सुनियोजित तरीके से करने की योजना बनाई थी। 06 जून 1858 की रात को 9 बज कर 20 मिनट पर बनारस से आए पुलिस विद्रोहियों ने छठी इन्फैंट्री छावनी के मैस पर हमला कर दिया जिसमें पैदल सेना के जवान भी विद्रोहियों की मदद कर रहे थे।‌ जान बचाकर भाग रहे अंग्रेज‌ उस समय वहीं पर ₹30 लाख छोड़ गए‌। इन सैनिकों ने अपने ही अधिकारियों को नजदीक से मार गिराया। वह विद्रोह की शुरुआत थी और शहर को अनियंत्रित विद्रोहों की दया पर छोड़ दिया गया जिससे शहर में पूरी तरह से अराजकता का माहौल था। 

इलाहाबाद में अनियंत्रित विद्रोहियों‌ और ब्रिटिश सैनिकों द्वारा शहर में अनावश्यक लूटपाट, सार्वजनिक संपत्ति के विनाश और रक्तपात को देखा तो मौलवी लियाकत ने अपने तलवार और अपने प्रमुख तोपची खुदाबख्श के तोप के गोलों के ज़ोर पर 07 जून 1858 को स्थिति पर नियंत्रण कर लिया। उन्होंने अपने नेतृत्व में विद्रोही सिपाहियों का विश्वास जीता, समदाबाद और रसूलपुर के मेवाती और कई ग्राम प्रधान के साथ मिलकर 7 जून 1857 को उन्होंने इलाहाबाद को अंग्रेजों से छीन लिया और अपनी सरकार चलाई।

उन्होंने शहर में कानून और व्यवस्था को लागू किया‌ और दिल्ली के मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के नाम के हरे और सफेद झंडे जिसमें उगता हुआ सूरज दर्शाया गया था के साथ शहर में एक जुलूस निकाला। सिपाहियों और पंडों का नेतृत्व सरदार रामचंद्र ने किया। मुसलमानों की अगुवाई मौलवी लियाकत हुसैन ने की। उनके नेतृत्व में इलाहाबाद की जनता, जिनमें आम मुस्लिम, ब्राह्मण, पंडा और पठान शामिल थे,अंग्रेजों के दमन के विरुद्ध मौलवी से कंधा मिलाकर बहादुर शाह जफर की सत्ता और वैभव को पुनः स्थापित किया।

उन्होंने दो व्यक्तियों सैफुल्ला और सुख राय को चायल परगना के तहसीलदार, दो कोतवाल, एक नायब और दो व्यक्तियों को सेना अधिकारी नियुक्त किया और अंग्रेजों को पूरी तरह से इलाहाबाद से खदेड़ दिया। मौलवी लियाकत अली ने खुसरो बाग को अपना सैन्य परिचालन मुख्यालय बनाया क्योंकि यह इलाहाबाद किले के पास शहर में उपलब्ध एकमात्र गढ़ वाली विशाल जगह थी‌ जिसकी दिवारें‌ किले की तरह ऊंची थीं।

इलाहाबाद में यमुना के किनारे अकबर के बनाए किले में पैंसठ तोपें, चार सौ सिख सैनिकों की एक चौकी और छठी मूल निवासी इन्फैंट्री के अस्सी सैनिक थे। अंग्रेजों के लिए किले का पूर्वी भारत में एक बहुत ही महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थान था। खुसरो बाग से उन्होंने उनके विरुद्ध युद्ध चलाया और इलाहाबाद के किले को अपने हाथ में लेने की कोशिश की लेकिन इसे हासिल करने में असफल रहे। मौलवी के चरित्र और बौद्धिकता की अखंडता से हिंदू और मुसलमान दोनों समान रूप से प्रभावित थे‌ और वह इलाहाबाद से अंग्रेजों को खदेड़ कर अपनी सरकार बनाने के बाद और‌ आगे बढ़ने ही वाले थे कि यहीं एक मुसीबत आ गयी।

इलाहाबाद शहर पर नियंत्रण करते ही मौलवी लियाकत अली को खबर मिली कि उनकी बहन‌ रानी लक्ष्मीबाई मुश्किलों में घिर गयीं हैं। उन्होंने अपनी बहन रानी लक्ष्मीबाई की मदद करने के लिए अपने प्रसिद्ध तोपची खुदा बख्श को इलाहाबाद से झांसी की रानी को मदद करने के लिए भेजा जहां सिंधिया की गद्दारी के कारण उन्हें युद्ध में शहादत मिली और खुदाबख्श झांसी की रानी की ओर से लड़ते हुए शहीद हो गये। झांसी की रानी की बुआ चंचल बाई उर्फ़ चंचल बीबी के नाम पर महगांव गांव की दरगाह में आज भी एक मस्जिद और उनकी कब्र है।

खैर‌ मौलवी‌‌ लियाकत अली की हुकूमत के 10 दिन भी नहीं हुए थे कि, 17 जून सन 1858 को अंग्रेजों ने इलाहाबाद को घेर लिया‌। इलाहाबाद में गड़बड़ी को रोकने में जनरल हैवलॉक की सहायता के लिए, बनारस से लेफ्टिनेंट कर्नल नील और अधिक बलों के साथ इलाहाबाद किले में पहुंचे। कर्नल नील एक दुर्दांत अंग्रेजी अफसर था , कर्नल नील ने मद्रास फ्यूजलर्स के साथ आधुनिक अस्त्र शस्त्र के सहारे रास्ते भर गांव उजाड़ता भारी तबाही मचाता हुआ इलाहाबाद पहुंचा। और इस कारण जनता में उसकी दहशत ज़ोरों में थी।

इस समय नगर क्षेत्र मौलवी‌ लियाकत अली के पूर्ण नियंत्रण में था। नील ने किले की अपनी तोपों को इलाहाबाद के मुहल्ले कीडगंज और दारागंज के नागरिक क्षेत्रों की दिशा में चलाने का आदेश दिया और इस पूरे रिहायशी इलाके में भगदड़ मच गई‌ और‌ लोग अपने घरों को छोड़कर भागने लगे। क्षेत्र से लोगों के सामूहिक पलायन से नील खुश था। नागरिकों को बचाने के लिए मौलवी‌ लियाकत अली ने अपनी सेना को कीडगंज और दारा गंज क्षेत्रों से हटा लिया। 

16 जून को नील ने अपने शक्तिशाली तोपखाने से खुसरो बाग पर तोपों से आक्रमण किया और भीषण लड़ाई हुई। नील ने सफलतापूर्वक खुसरो बाग पर कब्जा कर लिया , इस लड़ाई में सरदार रामचंद्र और उनके साथी अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गये। संघर्ष इतना भीषण था कि चौक स्थित शहर कोतवाली से 500 मीटर दूर स्थित खुसरो बाग आने में अंग्रेजों को सुबह से शाम हो गयी। लड़ाई की भीषणता का अंदाजा इससे लगाईए कि 3 महीने तक 8 गाड़ियां लगाकर सुर्योदय से सुर्यास्त तक लाशों को ढोया जाता रहा।

नील ने मौलवी के नियुक्त तहसीलदारों और एक सिपाही को फाँसी दे दी। लेकिन मौलवी‌‌ लियाकत अली अंग्रेजों की पहुंच से बाहर थे‌। इस तरह इलाहाबाद को 10 दिनों के बाद अंग्रेजों ने फिर से हासिल कर लिया। इसी बीच मौलवी‌ लियाकत अली को झांसी की रानी के मुश्किल में घिर जाने की खबर मिली और 17 जून की रात को मौलवी लियाकत हुसैन चुपके से कानपुर के लिए निकल गये। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई भी सिंधिया की गद्दारी के कारण शहीद हो गयीं , जिनकी शहादत को सुनकर मौलवी लियाकत अली ग्वालियर भागे और अंतिम संस्कार में छिपकर शामिल रहे।

इधर नील ने गांवों को जलाना शुरू कर दिया और महिला या पुरुष तथा उनकी उम्र की परवाह किए बिना मासूमों को विद्रोह की सज़ा देना शुरू कर दिया। लोगों को पेड़ों से लटका दिया गया। कई छोटे बच्चों को सिर्फ इसलिए फांसी पर लटका दिया गया क्योंकि वे ढोल पीट रहे थे और हाथों में उगते सूर्य का हरा सफेद झंडा लिए परेड कर रहे थे। 

इलाहाबाद शहर कोतवाली के पास चौक में खड़े "नीम के सात पेड़ों" पर कुछ ही दिनों में आठ सौ लोगों को फाँसी दे दी गई। इसी वजह से लोगों ने कर्नल नील को "इलाहाबाद का कसाई" नाम दे दिया। पूरा क्षेत्र उनके नियंत्रण में आ गया। इसके बावजूद इलाहाबाद के नाजिम , समदाबाद के मेवातियों और मौलवी‌ लियाकत हुसैन के अन्य साथियों के साथ आजादी की आग जला रहे थे।

ग्वालियर से वापसी पर मौलवी लियाकत अली कानपुर पहुँचे और नाना ढोंडू पंत, जिन्हें नाना साहब के नाम से जाना जाता है, और उनके आदमियों से मुलाकात की और अंग्रेजों के रुपए 30 लाख से बिठुर में नाना जी के साथ आगे की योजनाओं पर चर्चा की‌ और ब्रिटिश हुकूमत से संघर्ष जारी रखने का फैसला किया। उनके इलाहाबाद से जाने के बाद से उनको इलाहाबाद और आस-पास के गाँवों में नील के अत्याचारों की सूचना प्रतिदिन मिल रही थी। मौलवी लियाकत‌ अली से इलाहाबाद में अत्याचार की खबर सुनकर नाना ने बदला लेने का फैसला किया। 

कानपुर में नाना की सेना जनरल व्हीलर से भिड़ गयी और जनरल व्हीलर को नाना की सेना के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा। नाना ने उन्हें कानपुर छोड़ने की अनुमति दी और गंगा नदी पार करने के लिए उनके लिए नावों की व्यवस्था की। फिर दुर्भाग्य से 27 जून 1858 को सती चौरा घाट की घटना घटी। बैंक में छिपी बंदूकों ने अंग्रेज पुरुषों और महिलाओं पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं, जबकि उन्हें नाना ने इलाहाबाद के लिए सुरक्षित मार्ग का आश्वासन दिया था। नाना, जो इसमें शामिल नहीं थे‌ ब्रिटिश हुकूमत ने इसके लिए नाना को दोषी ठहराया।

दरअसल यह त्रासदी वास्तव में इलाहाबाद में नील के अत्याचारों का परिणाम थी और जिसकी खबर आग की तरह कानपुर तक पहुँची‌ और लोगों ने अंग्रेजों से बदला लेने के लिए इसे अंजाम दिया। काये, मैलेसन और चार्ल्स बॉल जैसे कई अंग्रेजी इतिहासकारों ने इलाहाबाद के नागरिकों की बर्बर हत्या के बारे में लिखा है। हेनरी हैवलॉक 30 जून को इलाहाबाद पहुंचे और कमान संभाली। 

मौलवी‌‌ लियाकत अली दिल्ली आए और बख्त खान से मिले जो उनको बहादुर शाह जफर के सामने ले गए। मौलवी लियाकत अली ने बहादुर शाह जफर को सारा घटनाक्रम समझाया। फिर मौलवी लखनऊ लौट आए। जुलाई 1857 में, फतेहपुर की लड़ाई के बाद, लोगों को सबक सिखाने के लिए हैवलॉक द्वारा सिख सेना को फतेहपुर शहर को जलाने का आदेश दिया गया था। इस कार्य के बाद, सिखों को इलाहाबाद में फिर से नील में शामिल होने का आदेश दिया गया। 

मौलवी‌‌ लियाकत अली ने फिर अपने आदमियों के साथ फतेहपुर-कानपुर रोड पर हैवलॉक को रोकने की कोशिश की, लेकिन इसे हासिल करने में नाकाम रहे। कानपुर में लड़ाई में हारने और नाना के‌ नेपाल भागने के बाद, मौलवी लियाकत अली ने उत्तरी भारत में अपनी गतिविधियों को जारी रखा। कुछ समय बाद उन्होंने भोपाल और सूरत होते हुए दक्षिण-पश्चिम की यात्रा की, वे सूरत से लगभग दस किलोमीटर दूर लाजपुर में रहने लगे। 

उन्होंने इस जगह को स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश राज के खिलाफ गतिविधियों का अपना नया केंद्र बनाया। उन्होंने अपना नाम बदला और छद्म नाम ग्रहण किया और अपना निवास स्थान बदल बदल कर मौलवी‌ लियाकत अली पूरे पंद्रह वर्षों तक अंग्रेजी अधिकारियों को चकमा देते रहे और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ते रहे। 1872 में, मौलवी लियाकत अली के दो साथियों ने मुखबिरी की और मौलवी लियाकत अली को बॉम्बे रेलवे स्टेशन पर एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी स्टाइल द्वारा गिरफ्तार किया गया।

उन्हें इलाहाबाद लाया गया और जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में मुकदमा चलाया गया। 24 जुलाई 1872 के फैसले में मौलवी लियाकत अली ने ईमानदारी से स्वीकार किया कि उन्होंने ब्रिटिश राज के खिलाफ क्या किया है और इस पर उनको गर्व है। उन्हें अंडमान की जेल मे आजीवन‌ कैद की सज़ा काटने के लिए भेजा गया जहां वह 20 साल अंडमान जेल में अंग्रेजों के ज़ुल्म को सहते हुए 17 मई 1892 को मृत्यु को प्राप्त हो गये।

 



Rizwan Ahmed (Saif)

 یہ صرف کہنے کے لئے نہیں کے ماں کے 

پیروں کے نیچے جنّت اور باپ جنّت کا 

دروازہ ہوتا ہے 

ہم لاکھ عبادت کریں لاکھ روزے رکھیں 

لاکھ تہجّد پڑھے لاکھ حج کریں 

اگر ہمارے ماں باپ ہمسے رازی نہیں 

تو سب بیکار ہے، 


ये सिर्फ कहने के लिए के नहीं के माँ के पैरों के 
नीचे जन्नत और बाप जन्नत का दरवाज़ा होता है 
हम लाख इबादत करें लाख रोज़े रखें लाख 
तहाज्जुद पढ़ें लाख हज करें 
अगर हमारे माँ बाप हमसे नाराज़ हैं तो सब 
बेकार है, 

This is not just to say that mother's feet
paradise below,
And the father is the door to heaven
We do lakhs of prayers, keep lakhs of fasts
read tahajjud perform lakh hajj
If our parents are angry with us then everyone useless,



 عیسائی  صرف اپنے آپکو اسلئے عیسائی کہلاتا ہے 
کیونکے وو چاہتا ہے کے مجھے عیسا علیہیسسلام 
کے نام سے جانا جاوں 
لیکن مسلمان کہتا ہے می بریلوی ہوں دیوبندی ہوں 
وہابی ہوں فلانا فلانا ہوں سبکچھ کہتا ہے خود کو 
بس موموہممدی نہیں کہتا 
جب کے کہنا یہ چاہے الحمدلللہ 
میں مھممدی ہوں 

ईसाई सिर्फ इसलिए अपने आपको ईसाई कहलवाता है 
क्योंकि वो चाहता है के मैं ईसा अलैहिसलाम के नाम से 
जाना जाऊं 
लेकिन मुस्लमान कहता है के मैं बरेलवी हूँ देवबंदी हूँ वहाबी हूँ 
अहले हदीस हूँ फलाना फलाना हूँ 
खुद को सबकुछ कहता है बस ये नहीं 
कहता के अल्हम्दुलिल्लाह मैं मोहम्मदी हूँ 

Christians call themselves Christians just because
Because he wants me in the name of Isa Alaihissalam
let's go
But the Muslim says that I am a Barelvi, a Deobandi, a Wahhabi.
Ahle Hadith I am so-and-so
tells himself everything but not this
say that Alhamdulillah I am a Mohammedan


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